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संपादकीय

मतदाताओं की समझ पर सवाल न उठाएं

By Raj Express | Publish Date: 2/25/2017 12:36:54 PM
मतदाताओं की समझ पर सवाल न उठाएं

 महाराष्ट्र के नगर निकायों के चुनाव नतीजे भाजपा के पक्ष में गए हैं। इसके बाद से एक सवाल लगातार पूछा जा रहा है कि चुनाव आयोग को इन नतीजों को घोषित करने की जल्दी क्यों थी?तमाम सोशल नेटवर्किग वेबसाइटों पर लिखा जा रहा है कि वैसे तो अभी महाराष्ट्र में मतगणना ही नहीं कराई जानी चाहिए थी और दूसरे, अगर मतगणना हो भी गई थी तो निर्वाचन आयोग नतीजों को घोषित करने की जल्दी नहीं करता। उसे यह काम11मार्च तक टाल देना चाहिए था। बताते चलें कि यह वह तारीख है,जब पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के परिणाम हमें पता चलेंगे। तब तक के लिए महाराष्ट्र के परिणामों को टालने की बात इसलिए कही जा रही है कि अब जबकि ये आ चुके हैं, तब उत्तरप्रदेश के अगले तीन चरणों के मतदान पर इनका प्रभाव पड़ सकता है, माहौल भाजपा के पक्ष में बन सकता है। स्वाभाविक है कि जो लोग इस तरह की बात कर रहे हैं,वे भाजपा के विरोधी हैं। हालांकि,किसी राजनीतिक दल ने इस विषय में कुछ नहीं कहा है,हो सकता है कि आगे वह कुछ बोलें, क्योंकि भाजपा पर सवालों को उठाने का एक मौका मान सकते हैं,वे इसे। लेकिन फिलहाल तो बुद्धिजीवियों की तरफ से उठाए जा रहे हैं,प्रश्न। उनकी मानी जाए,तो महाराष्ट्र के नतीजे उत्तरप्रदेश पर असर डालेंगे।

ऐसे ही कुछ लोग निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता पर भी प्रश्न उठा रहे हैं। हमारा मानना है कि इस तरह की बातें करने से बचना होगा,सभी को। यह सही है कि हमारे देश में केवल न्यायपालिका ही है, जिसकी निष्पक्षता असंदिग्ध है, बाकी तो सभी संवैधानिक संस्थाओं के बारे में इस तरह का दावा कोई नहीं कर सकता और इसका कारण यह है कि आजाद भारत की प्राय:सभी सरकारों ने इन्हें अपने प्रभाव में रखने की कोशिश की है। इस स्थिति में यदि निर्वाचन आयोग भी सरकार के दबाव में हो तो इसमें हैरतअंगेज कुछ भी नहीं। ऐसे में जरूरत इन संस्थाओं को निष्पक्ष बनाने पर चर्चा की है,उन पर आरोप लगाने की नहीं। दूसरी बात,यह तर्क ठीक नहीं है कि महाराष्ट्र के चुनावों का असर उत्तरप्रदेश के शेष तीन चरणों के मतदान पर पड़ेगा। हाल ही में ओडिशा के निकाय चुनावों के परिणाम आए थे। भाजपा को वहां भी बढ़त मिली है। तब वह सवाल क्यों नहीं उठाया गया था, जो महाराष्ट्र के नतीजों को लेकर उठाया जा रहा है?क्या इसीलिए कि महाराष्ट्र में मुंबई भी शामिल है,जिसकी ओर पूरे देश ही नहीं,बल्कि दुनिया का भी ध्यान रहता है, जबकि ओडिशा की ओर किसी का ध्यान नहीं था? सवालों को अपनी सुविधा के अनुसार उठाने की प्रवृत्ति ठीक तो खैर नहीं है। हम सभी को इस वास्तविकता को भी समझना होगा कि एक राज्य के नतीजों का दूसरे राज्य के मतदान पर असर पड़ ही नहीं सकता। निकाय चुनाव के परिणामों का असर विधानसभा के लिए होने वाले मतदान पर पड़ना तो असंभव ही है।
दरअसल,निकाय चुनाव कहीं भी हों,उनके मुद्दे अलग होते हैं। मतदाता नालियों,सड़क,साफ-सफाई,बिजली-पानी,स्कूलों आदि के मुद्दों पर मतदान करता है। वह उन स्कूलों को मतदान का मुद्दा मानता है,जिन्हें नगर निगम,नगर पालिकाएं चलाती है और मतदान करते वक्त वह यह भी देखता है कि जिस पार्षद को वह चुन रहा है,वह उसके काम आएगा या नहीं?मतदाताओं को इन निकायों से अपने ज्यादातर काम कराने पड़ते हैं। बिजली एवं पानी के बिलों से लेकर जन्म-मृत्यु के प्रमाण-पत्रों तक के लिए जनता को इन निकायों के दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ते हैं। सो,मतदान करते समय वह देखता है कि उसका पार्षद ऐसा हो,जो उसके काम आए। इसके विपरीत,राज्य विधानसभाओं के चुनाव का फलक इससे विस्तृत होता है। जनता यह देखती है कि उसकी सरकार उसकी आशाओं-अपेक्षाओं पर खरी उतरी है या नहीं? हां,जातिवाद,क्षेत्रवाद का खोटा सिक्का सभी चुनावों में चलता है। लेकिन यह दोष है,लोकतांत्रिक सिद्धांत नहीं। सिद्धांत तो यही है कि मतदाता अपनी सरकार का प्रदर्शन देखते हैं और उनकी सभी कसौटियों पर यदि वह खरी उतरती है तो वे उसे फिर मौका देते हैं,वरना बदल देते हैं। मतदाता किसी लहर में नहीं बहते,बल्कि वे नेताओं की बात सुनते हैं और फिर अपने-अपने हिसाब से उनमें से किसी एक पर भरोसा जताते हैं। इस लिहाज से कहा जा सकता है कि उत्तरप्रदेश में केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार और राज्य की सपा सरकार ही कसौटी पर है। यदि कोई यह मानता है कि महाराष्ट्र के निकाय चुनाव उत्तरप्रदेश पर प्रभाव डालेंगे तो वह मतदाताओं की समझ पर ही प्रश्न उठा रहा है,जो नहीं किया जाना चाहिए।
बेशक,मतदाता विभिन्न दबावों,विभिन्न प्रलोभनों में फंसते ही हैं। इसीलिए राजनीतिक दल उन्हें लोभ-लालच देते भी दिखते हैं। इसके बावजूद उनकी समझ पर प्रश्न नहीं उठाया जा सकता। उनकी समझ और लोकतांत्रिक बने, प्रगतिशील बने,इसके लिए तो प्रयास किया जा सकता है, इस दिशा में सबसे ज्यादा कोशिश भी बुद्धिजीवियों को ही करनी चाहिए। मगर उनकी समझ पर प्रश्न उठाना ठीक नहीं है। महाराष्ट्र के मतदाताओं ने अपने हिसाब से जनादेश दिया,यूपी के वोटर यही काम अपने हिसाब से करेंगे।
हरीश कुमार‘शम्स’(राजनीतिक विश्लेषक)
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