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संपादकीय

चीन को आर्थिक मोर्चे पर जवाब दें

By Raj Express | Publish Date: 2/25/2017 12:41:59 PM
चीन को आर्थिक मोर्चे पर जवाब दें

 भारत के लिए पाकिस्तान बड़ी समस्या है या चीन,यह उसी तरह का सवाल है,जैसे यह पूछा जाए कि अमेरिका के लिए सबसे बड़ी समस्या उत्तर कोरिया है या सीरिया? समझने की बात तो यह है कि अमेरिका का काम सीरिया,उत्तर कोरिया से संबंध तोड़कर और उनका विरोध कर चल सकता है,पर भारत अपने पड़ौसी का क्या करे? एक बारगी पाकिस्तान तो दो बार की जंग में भारत के हाथों मिली हार के बाद हमारी घुड़की से सहम भी जाता है, पर आकार और ताकत में दैत्यनुमा चीन अपनी विस्तारवादी नीतियों और दबंगई वाली सोच के चलते सुधरता ही नहीं। वह भारत को हमेशा परेशान करता है।

बहरहाल,जब भारत किसी भी तरह से युद्ध में चीन से पार नहीं पा सकता और कूटनीतिक चालों में भी उसकी मात हो रही है,तब बेहतर यही है कि भारत चीन को लेकर विशेष रणनीति बनाए। अभी भारत के विदेश सचिव चीन की यात्र पर थे। उनके दौरे के दौरान भारत और चीन के बीच कई स्तरों पर बातचीत हुई। पर पहली बड़ी सामरिक बातचीत लगभग पांच घंटों तक चली,जिसमें परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह(एनएसजी)के विशिष्ट क्लब में भारत के प्रवेश और मसूद अजहर पर भारत की चिंताओं को लेकर कोई नतीजा नहीं निकल सका। हालांकि, दावा किया जा रहा है कि बातचीत सार्थक रही है।
गौरतलब है कि हमारे विदेश सचिव एस.जयशंकर ने अपने चीनी समकक्ष झांग येसुई, जो चीनी विदेश मंत्रलय में कार्यकारी उपमंत्री भी हैं,की संयुक्त अध्यक्षता में यह सामरिक बैठक की थी,लेकिन चीन ने न तो एनएसजी में भारत के समर्थन की हामी भरी है,न ही वह पाकिस्तानी आतंकवादी मसूद अजहर को संयुक्त राष्ट्र की ओर से काली सूची में डालने के संवेदनशील मुद्दे पर भारत के साथ आने को तैयार है। उसने अपना रुख जरा भी नहीं बदला है। एनएसजी के मुद्दे पर चीन ने जो कहा है, उसका अर्थ सीधे-सीधे‘न’है,लेकिन उसने अपनी बात घुमा-फिराकर कूटनीतिक अंदाज में कही। चीन का कहना यह था कि वह एनएसजी की सदस्यता को लेकर भारत के आवेदन पर बातचीत को तैयार है। पर प्रक्रियाओं को लेकर उसके अपने विचार हैं और ये विचार भारत और एनएसजी के अधिकांश सदस्यों की राय से भिन्न हैं। इशारा साफ है कि हम ड्रैगन के वजूद को उसकी शर्तो पर स्वीकार करें,तो वह भी अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की मांग व अधिकार का समर्थन करेगा,अन्यथा नहीं। एनएसजी में भारत की एंट्री को लेकर चीन का कहना था कि हम कई बार कह चुके हैं कि यह बहुपक्षीय मुद्दा है। हम टू-स्टेप एप्रोच पर आज भी कायम हैं,जिसके तहत एनएसजी के सदस्य पहले गैर-परमाणु अप्रसार संधि वाले देशों की एंट्री को लेकर सिद्धांत तैयार करें और फिर संबंधित मामलों पर चर्चा की जाए। हमारे रुख में कोई बदलाव नहीं है। भारत के अलावा भी अन्य गैर-परमाणु अप्रसार संधि वाले देश अर्जी दे रहे हैं। सभी अर्जियों पर हमारा रुख समान है।
इस कूटनीतिक शब्दजाल का अर्थ यह है कि चीन नहीं चाहता कि भारत एनएसजी का सदस्य बने और उसकी यह मंशा भी साफ हो गई है कि यदि भारत को उसमें जगह दी जाती है तो पाकिस्तान को भी मिलनी चाहिए। इसी तरह संयुक्त राष्ट्र में जैश-ए-मोहम्मद के सरगना और मुंबई हमले के मास्टर माइंड मसूद अजहर को अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित कराने की भारत की कोशिशों पर चीन का तर्क था,वह भारत के प्रस्ताव का समर्थन तभी करेगा,जब कोई पुख्ता सबूत होगा। झांग के शब्दों में-‘चीन न्याय,निष्पक्षता व प्रोफेशनलिज्म के सिद्धांतों का समर्थन करता है और उसके लिए जरूरी चर्चा में हिस्सेदारी की वकालत करता है। चाहे पिछले साल भारत द्वारा दी गई अर्जी की बात हो या इस साल की,हमारा रुख बदला नहीं है। हमारा मानदंड सिर्फ एक है,हमें पुख्ता सबूत चाहिए। सबूत हैं,तो अर्जी को मंजूरी मिल सकती है। अगर पुख्ता सबूत नहीं हैं तो सहमति बनना मुश्किल है।’झांग ने कहा-1267कमेटी पर ताजा डेवलपमेंट यह है कि संबंधित देशों ने कमेटी के सामने एक और अर्जी दी है। कमेटी के सदस्य अभी संबंधित पक्षों से बात कर रहे हैं और अभी तक इस पर आम सहमति नहीं बन पाई है। हालांकि,मसूद अजहर के खिलाफ पुख्ता सबूत की चीन की मांग पर भारत का तर्क था कि उसकी करतूत दस्तावेजों में अच्छी तरह लिपिबद्ध है और कम से कम इस बार सबूत की जिम्मेदारी भारत पर नहीं है। लेकिन चीन ने हमारी दलील को सुनना-समझना कतई जरूरी नहीं समझा। वह आतंकवाद के पक्ष में जिस तरह से पहले था,उसी तरह से अब भी बना हुआ है। मसूद अजहर के खिलाफ इस बार सबूत देने की हमारी जिम्मेदारी इसलिए नहीं है, क्योंकि उस पर बैन के लिए इस साल लाया गया प्रस्ताव अमेरिका की तरफ से आया था,जिसे ब्रिटेन और फ्रांस का समर्थन हासिल था। इसीलिए जयशंकर ने यह साफ किया कि मसूद अजहर पर संयुक्त राष्ट्र की1267कमेटी के प्रतिबंध का (अमेरिकी) प्रस्ताव तार्किक था और उसे सिर्फ भारत ही नहीं, दूसरे देशों का भी समर्थन हासिल था। विदेश सचिव ने यह भी स्पष्ट किया कि मसूद पर आम सहमति इसलिए नहीं बनती,क्योंकि चीन हमारे साथ नहीं है।
साफ है कि चीन भारत के साथ सांप-सीढ़ी का यह खेल खेलता ही रहेगा,अगर उसे उसी के अंदाज में जवाब नहीं दिया गया तो। उसकी सबसे बड़ी ताकत है, उसकी आबादी, जो मन्यूफैक्चरिंग सेक्टर से जुड़कर एक तरह से समूची दुनिया के उत्पादन पर कब्जा जमाए हुए है। अमेरिका की हालत ट्रेडर की रह गई है। लगभग सभी बड़ी अमेरिकी कंपनियों की मैन्युफैक्चरिंग यूनिट चीन में जरूर है। चीन न केवल अपने क्लाइंटों के लिए सामान बनाता है,बल्कि उसकी कॉपी करके सस्ता माल तैयार करता और फिर तीसरी दुनिया के लगभग सभी देशों, जिनमें भारत भी एक बड़ा खरीदार है,को बेच देता है।
इससे उसे दोहरा लाभ है। उसकी बड़ी आबादी को रोजगार तो हासिल है ही,उसकी अर्थव्यवस्था भी मजबूत है। जबकि भारत के लोग‘ह्वाइट कॉलर जॉब’में तो चीन से मुकाबला कर रहे हैं,पर उत्पादन के क्षेत्र में नहीं। हमें अगर चीन का मुकाबला करना है,तो हमें कम से कम भारत से संचालित होने वाली उसकी अर्थव्यवस्था पर चोट पहुंचानी होगी। अपने यहां के लोगों को उत्पादन के क्षेत्र में तो लगाना ही होगा,ऐसे उत्पाद भी तैयार करने होंगे, जो चीनी सामानों के मुकाबले सस्ते भी हों एवं टिकाऊ भी। इनसे हमारी इकोनॉमी भी मजबूत होगी और जब चीन को उसके फ्रंट पर टक्कर मिलेगी,तो वह हमारी बात सुनने को बाध्य होगा। भारत का यह उत्तर चीन को युद्ध या कूटनीति के मैदान में मिलने वाले जवाब से ज्यादा भारी पड़ेगा। बशर्ते हमारे हुक्मरान इसे समझें। अगर वे इसे नहीं समझे तो चीन हमें हमेशा आंखें ही दिखता रहेगा।
 जयप्रकाश पांडेय (अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार)
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