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आंगन से क्यों गायब हो रही नन्ही गौरैया

By Raj Express | Publish Date: 3/20/2017 4:52:33 PM
आंगन से क्यों गायब हो रही नन्ही गौरैया

विज्ञान और विकास के बढ़ते कदम ने हमारे सामने कई चुनौतियां भी खड़ी की हैं, जिससे निपटना हमारे लिए आसान नहीं है। विकास की महत्वाकांक्षी इच्छाओं ने हमारे सामने पर्यावरण की विषम स्थिति पैदा की है, जिसका असर इंसानी जीवन के अलावा पशु-पक्षियों पर साफ दिखता है। इंसान के बेहद करीब रहने वाली कई प्रजाति के पक्षी और चिड़िया आज हमारे बीच से गायब है। उसी में एक है स्पैरो यानी नन्ही सी गौरैया। गौरैया हमारी प्रकृति और उसकी सहचरी है। गौरैया की याद आज भी हमारे जेहन में ताजा हैं। कभी वह नीम के पेड़ के नीचे फूदकती और अम्मा की तरफ से बिखेरे गए चावल या अनाज के दाने को चुगती। नवरात्र में अम्मा अक्सर मिट्टी की हांडी नीम के पेड़ तले गाड़ती और चिड़िया के साथ दूसरे पक्षी अपनी प्यास बुझाते। लेकिन बदलते दौर और नई सोच की पीढ़ी में पर्यावरण के प्रति कोई सोच ही नहीं दिखती है। अब बेहद कम घरों में पक्षियों के लिए इस तरह की सुविधाएं उपलब्ध होती हैं। प्यारी गौरैया कभी घर की दीवाल पर लगे ऐनक पर अपनी हमशक्ल पर चोंच मारती तो की कभी खाट के नजदीक आती। बदलते वक्त के साथ आज गौरैया का बयां दिखाई नहीं देता। एक वक्त था, जब बबूल के पेड़ पर सैकड़ों की संख्या में घोंसले लटके होते और गौरैया के साथ उसके चूजे चीं-चीं-चीं का शोर मचाते। सब कुछ कितना अच्छा लगता। लेकिन वक्त के साथ गौरैया एक कहानी बन गई है। गौरैया इंसान की सच्ची दोस्त भी है और पर्यावरण संरक्षण में उसकी खास भूमिका भी है। दुनियाभर में 20 मार्च गौरैया संरक्षण दिवस के रूप में मनाया जाता है। दिलावर के प्रयासों से इस दिवस को चुलबुली चंचल गौरैया के लिए रखा गया। 2010 में पहली बार यह दुनिया में मनाया गया।प्रसिद्ध उपन्यासकार भीष्म साहनी जी ने अपने बाल साहित्य में गौरैया पर बड़ी अच्छी कहानी लिखी है ।

घास के बीज गौरैया को बेहद पसंद 

गौरैया की पहचान क्या होती है। अक्सर यह सवाल आपके मन में उभरता होगा। दरअसल, नर गौरैया के गले के नीचे काला धब्बा होता है। वैसे तो इसके लिए सभी प्रकार की जलवायु अनुकूल होती है। लेकिन यह पहाड़ी इलाकों में नहीं दिखती है। ग्रामीण इलाकों में अधिक मिलती है। गौरैया घास के बीजों को अपने भोजन के रूप में अधिक पसंद करती है। गौरैया की घटती संख्या पर्यावरण प्रेमियों के लिए चिंता का कारण है। इस पक्षी को बचाने के लिए वन एवं पर्यावरण मंत्रलय की ओर से कोई खास पहल नहीं दिखती है। दुनियाभर के पर्यावरणविद् इसकी घटती आबादी पर चिंता जाहिर कर चुके हैं।

गौरैया को खलता है अधिक तापमान

बढ़ती आबादी के कारण जंगलों का सफाया हो रहा है। ग्रामीण इलाकों में पेड़ काटे जा रहे हैं। ग्रामीण और शहरी इलाकों में बाग-बगीचे खत्म हो रहे हैं। इसका सीधा असर इन पर दिख रहा है। गांवों में अब पक्के मकान बनाए जा रहे हैं, जिस कारण मकानों में गौरैया को अपना घांेसला बनाने के लिए सुरक्षित जगह नहीं मिल रही है। पहले गांवों में कच्चे मकान बनाए जाते थे। उसमें लकड़ी और दूसरी वस्तुओं का इस्तेमाल किया जाता था। कच्चे मकान गौरैया के लिए प्राकृतिक वातावरण और तापमान के लिहाज से अनुकूल वातावरण उपलब्ध करते थे। लेकिन आधुनिक मकानों में यह सुविधा अब उपलब्ध नहीं होती है। यह पक्षी अधिक तापमान में नहीं रह सकता है। शहरों में भी अब आधुनिक सोच के चलते जहां पाकरे पर संकट खड़ा हो गया। वहीं गगन चुंबी ऊंची इमारतें और संचार क्रांति इनके लिए अभिशाप बन गई।

 
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