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संपादकीय

योगी की योग्यता की परीक्षा प्रारंभ

By Raj Express | Publish Date: 3/20/2017 11:20:07 AM
योगी की योग्यता की परीक्षा प्रारंभ
गोरक्ष पीठ के महंत योगी आदित्यनाथ उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री बन चुके हैं। दो उपमुख्यमंत्रियों-केशव प्रसाद मौर्य और दिनेश शर्मा समेत उनके मंत्रिमंडल में कुल 44 सदस्य हैं। चूंकि चुनाव में भाजपा ने एक भी मुस्लिम को टिकट नहीं दिया था, इसलिए उस पर ध्रुवीकरण करने का आरोप लगता रहा था, जिसे अब धो दिया गया है, मोहसिन रजा को मंत्रिमंडल में शामिल करके। इसके बाद योगी सरकार की दिशा भी स्पष्ट हो गई है। यह कहना तो शायद गलत होगा कि उत्तरप्रदेश की नई सरकार हिंदुत्ववादी मुद्दों की तरफ देखेगी भी नहीं। समय-समय पर वह निश्चित ही राम मंदिर, समान नागरिक संहिता, तीन तलाक, गौहत्या जैसे सवाल उठाती रहेगी, लेकिन मंत्रिमंडल में जिस तरह का संतुलन बनाया गया है, उससे साफ है कि उसका मूल फोकस विकास पर ही रहेगा और यही वह काम भी है, जिसकी उत्तरप्रदेश को सबसे ज्यादा जरूरत है। न तो राज्य में मानव संसाधन की कमी है और न ही प्राकृतिक संसाधनों की भी। अत: योगी सरकार अगर विकास पर ही ध्यान देगी तो उत्तरप्रदेश की किस्मत बदलने की पूरी संभावना है। यह राज्य विकास की दौड़ में इसीलिए पीछे है कि पूर्ववर्ती सरकारें सिर्फ जातिवाद के सहारे राजनीति करती रही हैं। उन्हें जातिगत पूर्वाग्रहों -दुराग्रहों का शमन करना चाहिए था, लेकिन वे विभिन्न जातियों में दूरियां बढ़ाती ही देखी गईं। इस काम में न मुलायम सिंह यादव अपने कार्यकाल में पीछे रहे, न मायावती अपने समय में। पिछले विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव से जनता ने बहुत सी उम्मीदें लगाई थीं, मान लिया था कि वे मुलायम सिंह यादव के पुत्र जरूर हैं, लेकिन उनके नक्शेकदम पर नहीं चलेंगे। इस उम्मीद का मूल कारण यह था कि वे उच्च शिक्षित हैं, उनकी उच्च शिक्षा आस्ट्रेलिया में हुई है। लेकिन अगर हम उनके कार्यकाल के अंतिम चार-पांच महीनों को छोड़ दें तो बाकी समय तो उनकी सरकार उसी अंदाज में चली, जैसी एक समय मुलायम सिंह यादव की चलती थी। एक जाति विशेष के अफसरों के हवाले लगभग पूरा प्रशासन मुलायम के जमाने में रहता था, मायावती के जमाने में भी और फिर उसी र्ढे पर अखिलेश यादव की पूर्व सरकार भी दौड़ती रही थी। इस स्थिति में विकास संभव ही नहीं था। अत: उत्तरप्रदेश पीछे चला गया, जिसे आगे लाने की चुनौती अब योगी आदित्यनाथ के सामने है। इन सभी चुनौतियों से जूझने की उनकी क्षमता भी असंदिग्ध है, पर क्या वे उन चुनौतियों से भी जूझ पाएंगे, जो कि उनका अतीत उन्हें देगा? नाथ संप्रदाय, जिसकी स्थापना संत मत्स्येंद्र नाथ ने की और अब योगी के हाथ में जिसकी बागडोर है, वह सामाजिक समरसता की स्थापना के लिए जाना जाता है। जाति व्यवस्था के खिलाफ व हिंदू-मुसलमानों को करीब लाने का जितना काम नाथ संप्रदाय के संतों ने किया, वैसा किसी और ने नहीं किया। लेकिन योगी फायर ब्रांड हिंदुत्ववादी नेता हैं। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती भी अपनी इसी छवि से मुक्त होने की है। वे इससे मुक्त होते हैं या इसी छवि के साथ काम करते हैं, इसका पता हमें बाद में चलेगा।
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