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संपादकीय

गोवा और मणिपुर में विकास कार्य कठिन!

By Raj Express | Publish Date: 3/21/2017 11:08:27 AM
गोवा और मणिपुर में विकास कार्य कठिन!

 पांच राज्यों में विधानसभा के चुनाव हुए थे, जिनमें से केवल पंजाब ही कांग्रेस के पास गया, शेष चारों सूबों में भाजपा की सरकारें बन चुकी हैं। उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड में तो इस पार्टी के पास दो-तिहाई से भी ज्यादा बहुमत था, पर गोवा एवं मणिपुर में भी भाजपा की ही सरकारें बनी हैं। अब बीरेन सिंह के नेतृत्व वाली मणिपुर की भाजपा सरकार ने विधानसभा में भी अपना बहुमत सिद्ध कर दिया है, जबकि गोवा की मनोहर पर्रिकर सरकार यह काम बहुत पहले कर चुकी है। इस तरह मणिपुर, गोवा, उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड में न केवल भाजपा की सरकारें कायम हो चुकी हैं, बल्कि अब उनसे सामने उन वादों को पूरा करने की भी चुनौती है, जो भाजपा ने अपने चुनाव अभियान के दौरान इन राज्यों की जनता से किए थे। लेकिन वादों की चर्चा से पहले यह  जान लेना जरूरी है कि इन राज्यों की सत्ता जिन लोगों को दी गई है, वे किन परिस्थितियों में मुख्यमंत्री बने हैं। जब तक हम इनकी परिस्थितियों को नहीं समझेंगे, यह विश्लेषण मुश्किल हो जाएगा कि ये सरकारें जनता की कसौटियों पर खरी उतरेंगी भी या नहीं। सभी सरकारों के कामकाज में उन परिस्थितियों का योगदान कुछ ज्यादा होता है, जिनकी वजह से उनका गठन होता है। यह सही है कि इन सरकारों के कामकाज पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सीधी नजर होगी, क्योंकि आम जनता ने कुल मिलाकर वोट उन्हें ही दिया है। लिहाजा, वह जवाब भी उन्हीं से मांगेगी एवं यह वह स्थिति है, जिसके बारे में मोदी समझते ही होंगे। इसीलिए वे और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह इन पर नजर रखेंगे, मगर सच यह भी है कि निगरानी की एक सीमा होगी। दरअसल, प्रधानमंत्री के पास अपने काम होते हैं, जबकि पार्टी अध्यक्ष के पास अपने। जहां प्रधानमंत्री को देश-विदेश के अपने काम देखने हैं, तो वहीं अमित शाह की परीक्षा के अनेक केंद्र हैं। पांच राज्यों के चुनावों के बाद गुजरात, कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश विधानसभाओं के चुनावों की तैयारियों में वे लग गए होंगे और अगर नहीं लगे होंगे तो जल्दी ही लग जाएंगे। इस तरह वर्तमान राजनीति की फिलहाल सबसे ताकतवर जोड़ी के पास अपनी सरकारों के प्रदर्शन पर एक हद से ज्यादा नजर रखने का समय नहीं हो सकता। ऐसे में चुनावी वादों को पूरा करने का सबसे बड़ा जिम्मा इन चारों राज्य सरकारों पर ही है और तब इनकी क्षमताओं का आकलन करने के लिए हमें उन परिस्थितियों को देखना ही होगा, जिनमें ये गठित हुईं। शुरुआत यदि गोवा से करें तो मनोहर पर्रिकर को रक्षा मंत्रलय  से हटाकर इस राज्य की बागडोर इसीलिए सौंपी गई है कि भाजपा को समर्थन देने वालों ने खुलकर कह दिया था कि यदि मुख्यमंत्री के पद पर पर्रिकर नहीं तो समर्थन भी नहीं। ऐसे में नहीं कहा जा सकता है कि इस तरह की ब्लैकमेलिंग आगे नहीं होगी व पर्रिकर सरकार को अपने चुनावी वादे पूरे करने में दिक्कत नहीं आएगी। मणिपुर की कहानी तो इससे भी ज्यादा उलझी हुई है। कहा जाता है कि बीरेन सिंह मुख्यमंत्री पद मिलने की शर्त पर ही अपनी पार्टी कांग्रेस को छोड़कर भाजपा में आए थे। अगर यह बात सही है तो मानना यह भी पड़ेगा कि ज्यों ही भाजपा के शीर्ष नेतृत्व से उनकी पटरी नहीं बैठेगी, वे फिर अपनी पर आ जाएंगे। यह भी छिपा नहीं है कि जब वे अपनी पर आ जाते हैं, तो बहुत कुछ कर डालते हैं। यह मानने वालों की कमी नहीं है कि जिन नगा संगठनों ने पिछले करीब पौने पांच महीनों से मणिपुर की आर्थिक नाकेबंद कर रखी थी, उन्हें बीरेन सिंह की शह प्राप्त थी। यह नाकेबंदी राज्य में पांच नए जिलों को बनाने के विरोध में की गई थी। कहने वाले कहते हैं कि यह इसलिए कराई गई थी कि इबोबी सिंह सरकार पर त्याग -पत्र देने के लिए दबाव बनाया जा सके। फिर, स्थानीय निकायों में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने का भी नगा संगठनों ने विरोध किया, जिसके कारण इबोबी सिंह को तो जाना पड़ा, मगर बीरेन सिंह मुख्यमंत्री नहीं बन पाए, तो वे भाजपा में चले आए। हालांकि, वे अब मुख्यमंत्री बन गए हैं, लेकिन यह मानना गलत होगा कि उनके आवागमन पर पूर्ण विराम लग जाएगा और यह भी कि वे अब भाजपा के चुनावी वादे पूरे करेंगे एवं अपने एजेंडे को आगे नहीं बढ़ाएंगे। उनका प्रमुख एजेंडा यह है कि राज्य में उनका कद किसी भी पार्टी से ऊंचा होना चाहिए। पार्टी की पहचान उन्हीं से हो, वे किसी पार्टी के कारण न पहचाने जाएं। तब लगता नहीं है कि भाजपा उनकी महत्वाकांक्षाओं को नियंत्रित कर पाएगी। लेकिन उत्तराखंड और उत्तरप्रदेश की स्थिति इस पार्टी के लिए मुफीद है। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत आरएसएस के प्रचारक रहे हैं। अत: वे निश्चित ही काम करेंगे। इधर, उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हैं। वे निश्चित ही कट्टर हिंदुत्व के पैरोकार हैं, लेकिन जो उन्हें जानते हैं, वे यह भी जानते ही होंगे कि योगी-राज में भ्रष्टाचार नामुमकिन की हद तक असंभव है व कानून व्यवस्था को भी दुरुस्त होना ही पड़ेगा। मगर चुनावी वादों को पूरा करने की चुनौती योगी के सामने भी है और त्रिवेंद्र सिंह रावत के सामने भी। भाजपा वादों के पहाड़ पर बैठी हुई है। अत: अब चारों राज्यों में उसे कठिन परीक्षा के दौर से गुजरना होगा।

डॉ. आरके महाजनी (राजनीतिक विश्लेषक) 

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